’West Bengal Election 2026 : पश्चिम बंगाल के चुनावी मैदान में इस बार मुद्दों की नहीं, मसालों की बहार है। लोकतंत्र के इस महापर्व में विकास, बेरोज़गारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बेस्वाद मुद्दे अब आउटडेटेड हो चुके हैं—अब तो चर्चा का केंद्र है झालमूड़ी! और वजह? Narendra Modi का एक निवाला।
अब ज़रा सोचिए—देश में महंगाई का ग्राफ चाहे चढ़े या गिरे, बेरोज़गारी आंकड़ों में छिप जाए, लेकिन अगर प्रधानमंत्री ने सड़क किनारे झालमूड़ी खा ली, तो बस… मीडिया को नया नेशनल इश्यू मिल गया। एंकरों के चेहरे पर वो चमक आ जाती है, जैसे उन्हें टीआरपी का “चटपटा चूरन” मिल गया हो।
मीडिया का मेन्यू: खबर कम, स्वाद ज्यादा
आजकल टीवी चैनलों का हाल किसी पांच सितारा होटल जैसा हो गया है—जहाँ न्यूज़ नहीं, “न्यूज़ प्लेटर” परोसी जाती है। “मोदी ने क्या खाया?”, “कैसे खाया?”, “कितने चम्मच खाया?”—इन सवालों पर ऐसे डिबेट होती है, जैसे देश की अर्थव्यवस्था इसी पर टिकी हो। कभी 2000 के नोट में चिप ढूंढने वाली एंकर, आज झालमूड़ी के मसालों में राष्ट्रवाद खोज रही हैं। कभी विपक्ष को गरियाना इनका पेशा था, अब झालमूड़ी को “सांस्कृतिक कनेक्ट” बताना इनका धर्म बन गया है।
चरणवंदना का स्वर्णिम युग
2014 के बाद मीडिया ने पत्रकारिता से ज्यादा “प्रसाद वितरण” का काम संभाल लिया है। कौन ज्यादा चापलूस—यही अब टीआरपी का नया पैमाना है। मेकअप की मोटी परतों के नीचे छुपती झुर्रियां शायद इस बात की गवाह हैं कि सच बोलते-बोलते नहीं, सच छुपाते-छुपाते उम्र बीत रही है।
विदेश दौरे से लेकर झालमूड़ी तक
याद करिए वो विदेशी दौरा, जब शिकायती अंदाज से कहा गया—“अंदर घुसने नहीं दिया!”और फिर मोदी की“ओ माई गॉड!” वाली प्रतिक्रिया! जब वहां के अखबारों में कुछ खास नहीं मिला, तो खबर को एंगल देने का पुराना तरीका अपनाया गया—“कुछ तो होगा… खोजो!” आज वही खोज बंगाल की झालमूड़ी में जारी है।
एंगल की राजनीति: हिंदू-मुस्लिम से झालमूड़ी तक
हिंदू-मुस्लिम एंगल पुराना पड़ गया। पाकिस्तान वाला एंगल भी “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद फीका पड़ गया। बिहार चुनाव खत्म—वो मुद्दा भी गया। तो अब क्या बचा?
झालमूड़ी!
क्योंकि लोकतंत्र में मुद्दे नहीं, मौके चलते हैं। और मीडिया को हर हाल में “कुछ चलाना” होता है।
जनता का स्वाद बनाम मीडिया का मसाला
जनता शायद अभी भी रोजगार, महंगाई और भविष्य के बारे में सोच रही है। लेकिन मीडिया ने तय कर लिया है—उसे स्वाद सिखाना है। “देखिए कैसे प्रधानमंत्री ने आम आदमी की तरह झालमूड़ी खाई”— जैसे आम आदमी रोज़ यही देख कर पेट भरता हो!
व्यंग्य का कटाक्ष
लोकतंत्र अब सवालों से नहीं, स्नैक्स से चल रहा है। जहाँ पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना था, वहाँ अब काम है— सत्ता के हर कौर को ‘ऐतिहासिक’ बताना। और जनता?
वो बस टीवी के सामने बैठी सोच रही है— “देश बदले या न बदले… कम से कम झालमूड़ी का स्वाद तो नेशनल हो गया!”
अगर यही चलता रहा, तो अगली चुनावी बहस का विषय होगा— “प्रधानमंत्री ने चाय में कितनी चीनी डाली?”
और यकीन मानिए…उस पर भी 9 बजे महाभारत जरूर होगा।
