Dushyant Chautala : हरियाणा की सियासत में इन दिनों दुष्यंत चौटाला लगातार पत्रकार वार्ताओं में एक ही बात दोहरा रहे हैं—“महापंचायत होगी, अगर कार्रवाई नहीं हुई तो जनता जो फैसला करेगी, वही करेंगे।” लफ्ज़ कड़े हैं, लहजा तल्ख़ है, और अंदाज़ ऐसा मानो कोई बड़ी जंग छेड़ने की तैयारी हो। मगर सवाल वही पुराना—क्या यह सच में इंसाफ की लड़ाई है, या फिर सियासी जमीन वापस पाने की एक नई तदबीर?
यादों का आईना: किसान आंदोलन का वो दौर
जब 2020–2021 किसान आंदोलन अपने उफान पर था, तब हरियाणा का किसान सड़कों पर था—ठंड, गर्मी, बारिश सब झेलते हुए। उसी दौर में किसानों ने दुष्यंत चौटाला और उनकी पार्टी से उम्मीद की थी कि वे उनके “अपनों” की तरह साथ खड़े होंगे।
लेकिन हुआ क्या?
तब उन्होंने सत्ता के साथ खड़े रहने का फैसला लिया—क्योंकि वे उसी सत्ता का हिस्सा थे, जिसके खिलाफ आज आवाज बुलंद कर रहे हैं। किसानों की मांगों के बजाय सरकार के पक्ष में बयानबाज़ी हुई। आज जो “जनता के फैसले” की बात कर रहे हैं, तब वही जनता बार-बार दरवाज़ा खटखटा रही थी—मगर जवाब में खामोशी और इन्कार मिला।
परिवार के बयान: किसके साथ खड़े थे तब?
उस वक्त सिर्फ दुष्यंत ही नहीं, पूरा चौटाला परिवार एक सुर में नजर आया—सियासी लकीर साफ थी और रुख भी बेबाक। अजय चौटाला ने खुलकर सरकार के फैसलों का समर्थन किया। दिग्विजय चौटाला ने कई मौकों पर आंदोलन को लेकर सवाल उठाए। नैना चौटाला ने सत्ता के साथ खड़े रहने को “ठीक” ठहराया। उस वक्त किसानों की आवाज़ को “सियासत” कहकर खारिज किया गया, और आज वही नेता “जनता के फैसले” की दुहाई दे रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ रुख का नहीं, बल्कि साफ मौकापरस्ती का इशारा देता है।
ज्यादती का सच: जब किसानों पर बरसी लाठियां
आज पुलिस पर “गुंडागर्दी” और “ज्यादती” के आरोप लगाए जा रहे हैं। लेकिन क्या उस वक्त की तस्वीरें इतनी जल्दी भुलाई जा सकती हैं? हरियाणा में कई जगह किसानों पर बल प्रयोग हुआ। कुरुक्षेत्र जैसे इलाकों में लाठीचार्ज की घटनाएं सामने आईं। सैकड़ों किसानों ने आंदोलन के दौरान अपनी जान गंवाई—ये सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि परिवारों की बर्बादी की कहानी हैं। यह वही दौर था जब किसान अपने हक के लिए सड़कों पर थे, और सत्ता उनके सामने खड़ी थी—साथ नहीं। तब सत्ता में शामिल लोग खामोश थे, आज वही पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं—यही तज़ाद (विरोधाभास) जनता को खटकता है।
उम्मीदें और हकीकत: “अपनों” से मिली मायूसी
किसान दुष्यंत चौटाला को अपना मानते थे—एक ऐसा चेहरा, जो उनकी आवाज़ बनेगा। उन्होंने उम्मीद की थी कि “जननायक” उनके हक में खड़ा होगा, सत्ता की कुर्सी से ऊपर उठकर। मगर जब वक्त आया, तो वही “अपना” सबसे दूर नजर आया। यह सिर्फ सियासी नुकसान नहीं था, बल्कि भरोसे का टूटना था—और सियासत में भरोसा एक बार टूट जाए, तो उसे जोड़ना आसान नहीं होता।
आज का गुस्सा: हकीकत या सियासी गर्मी?
आज दुष्यंत चौटाला का लहजा बदला हुआ है—“जनता जो कहेगी वही करेंगे”, “अन्याय नहीं सहेंगे”, “महापंचायत होगी”…यह गुस्सा अचानक क्यों उभर आया? क्या यह सच में अन्याय के खिलाफ आवाज है, या फिर खोए हुए जनाधार को वापस पाने की कोशिश? सियासत में यह भी एक पुराना उसूल है—जब सत्ता हाथ से निकलती है, तो तेवर अचानक तेज हो जाते हैं। और यही आज साफ नजर आ रहा है।
जनता का फैसला: यादें लंबी होती हैं
जनता की याददाश्त उतनी कमजोर नहीं होती, जितना नेता समझ लेते हैं। उसे याद है— किसने साथ दिया, किसने दूरी बनाई, और किसने वक्त के हिसाब से अपना रुख बदला। आज “महापंचायत” की बात हो रही है, लेकिन असली पंचायत तो जनता के दिल में पहले ही लग चुकी है।
सवाल अब भी वही है
आखिर में सवाल वही खड़ा होता है—जब किसान सड़कों पर थे, तब आप कहां थे? जब लाठियां चल रही थीं, तब आपकी आवाज क्यों नहीं उठी? आज “जनता का फैसला” मानने की बात हो रही है, मगर जनता तो अपना फैसला बहुत पहले सुना चुकी है। सियासत में वक्त बदलता है, किरदार बदलते हैं, मगर जनता का हिसाब—देर से सही, चुकता जरूर होता है।
