Editorial : जब डाक्टर मनमोहन सिंह ने कहा था “इतिहास मेरे कामों का मूल्यांकन करेगा।” यह वाक्य आज फिर गूंज रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज इतिहास सवाल पूछ रहा है—क्या लोकतंत्र की आत्मा को धीरे-धीरे कुचला गया और जनता चुपचाप देखती रही?यूपीए सरकार के दौर में बने RTE, RTI, भूमि अधिग्रहण कानून, मनरेगा, NFSA और FRA जैसे कानून महज़ योजनाएँ नहीं थे—वे संविधान के सामाजिक न्याय के वादे का विस्तार थे। आज वही कानून, बिना औपचारिक रूप से रद्द किए, व्यवस्थित ढंग से खोखले किए जा रहे हैं।
RTE: शिक्षा का अधिकार नहीं, अब कृपा का विषय
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 ने निजी स्कूलों में 25% सीटें गरीब बच्चों के लिए सुनिश्चित कीं। यह कानून बाज़ार और बराबरी के बीच एक ऐतिहासिक पुल था। लेकिन आज—बजट में कटौती, नियमों की जटिलता, हरियाणा जैसे राज्यों में RTE MIS पोर्टल बंद, दस्तावेज़ी अड़चनें, इन सबने मिलकर यह संदेश दे दिया कि गरीब बच्चे पढ़ेंगे—अगर सिस्टम चाहेगा। निजी स्कूल सुरक्षित हैं, सरकार निश्चिंत है, और माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के साथ लाचार खड़े हैं।
RTI: सवाल पूछने का अधिकार, अब खतरे में
RTI अधिनियम, 2005 ने सत्ता को पहली बार जनता के सामने जवाबदेह बनाया। यही कानून था जिसने घोटालों, फाइलों और बंद दरवाज़ों को खोला। फिर आया 2019 का संशोधन— सूचना आयुक्तों की स्वतंत्रता छीनी गई, सरकार को वेतन और कार्यकाल तय करने का अधिकार मिला। छूटों का दायरा बढ़ा, ऊपर से डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन कानून, जिसने “निजता” के नाम पर सूचना के रास्ते बंद करने का हथियार दे दिया।
परिणाम?
लाखों करोड़ के घोटाले—लेकिन सवाल पूछने वाला डर में।
मनरेगा से भूमि तक: अधिकार नहीं, नियंत्रण
मनरेगा का नाम बदला, फंड घटा, आधार लिंकिंग और डिजिटल हाजिरी ने मज़दूरों को बाहर किया, भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में किसान सहमति कमजोर की गई, BJP शासित राज्यों ने अपने कानून बनाकर सुरक्षा कवच तोड़ा। NFSA के तहत खाद्य सुरक्षा का कवरेज घटाने की सिफारिश, बजट में 31% कटौती। FRA 2006 के तहत आदिवासी अधिकार लगातार सवालों में। हर कानून का एक ही पैटर्न है—रद्द नहीं करो, कमजोर करो। विरोध नहीं होगा।
तो फिर जनता क्यों चुप है?
यह सबसे खतरनाक सवाल है। हिंदू राष्ट्रवाद का भावनात्मक आवरण, कल्याण योजनाओं से पैदा किया गया आभार, बिखरा हुआ, दिशाहीन विपक्ष, मीडिया का सत्ता-समर्पण, ED, UAPA, CBI जैसे कानूनों से भय का वातावरण। यह सब मिलकर एक ऐसा लोकतंत्र गढ़ रहे हैं जहाँ अधिकार छीने जाते हैं और जनता को एहसास भी नहीं होता। ईंधन महंगा हुआ—पर आंदोलन नहीं। स्कूल बंद हुए—पर सवाल नहीं। सूचना रुकी—पर शोर नहीं। इतिहास की अदालत में कौन कटघरे में होगा?
डॉ. मनमोहन सिंह ने कभी लोकप्रियता के शोर में काम नहीं किया। उन्होंने कानून बनाए, संस्थाएं सशक्त कीं और कहा— इतिहास फैसला करेगा। आज वही इतिहास धीरे-धीरे लिख रहा है—किसने अधिकार दिए और किसने उन्हें चुपचाप छीना। यह लेख किसी पार्टी के खिलाफ नहीं, उस चुप्पी के खिलाफ है जो लोकतंत्र को मारती है। अगर आज जनता नहीं जागी, तो कल इतिहास सिर्फ सरकार को नहीं— हमें भी दोषी ठहराएगा।
