Haryana Congress : जंगल का दरबार और वफादारी का मुखौटा
पंचतंत्र की वो कहानी फिर याद आ रही है जिसमें जंगल का शेर अपने ही दरबारियों से घिर जाता है। सब उसके वफ़ादार बनते हैं, लेकिन मौका मिलते ही वही लोग उसकी कुर्सी के नीचे से ज़मीन खींचने लगते हैं। जब शेर लौटकर सवाल करता है, तो हर कोई मासूमियत का चोला पहनकर कहता है – हुज़ूर, हम तो बेगुनाह हैं। Haryana Congress की मौजूदा हालत कुछ ऐसी ही नजर आ रही है।
गले की फांस बनी सियासत और बयानबाज़ी का बाज़ार
राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग का मसला अब भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए सिर्फ एक सियासी परेशानी नहीं, बल्कि एक ऐसी मुसीबत बन चुका है जो हर दिन नया रंग दिखा रही है। एक तरफ़ भारतीय जनता पार्टी और इनेलो के अभय सिंह चौटाला लगातार हमलावर हैं। चौटाला साहब का बयान अब लगभग रोज़ का रियाज़ बन चुका है कि हुड्डा की सियासत में अब कोई न कोई अंदरूनी समझौता जरूर चल रहा है।
बयान का बम और सियासत की चिंगारी
दूसरी तरफ़ भाजपा के मंत्री कृष्ण बेदी का बयान पूरे मामले को और ज्यादा पेचीदा बना देता है। उनका दावा है कि शैली चौधरी के वोट को रोकने की कोशिश की गई थी, लेकिन बीच में दखल देकर वोट डलवाया गया। अब अगर इस बात में जरा भी सच्चाई है, तो सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर असल खेल क्या था और अब किसे बचाने की कोशिश हो रही है।
सबकी जुबान एक जैसी, मामला कुछ ज्यादा ही साफ
जिन Haryana Congress विधायकों पर क्रॉस वोटिंग के इल्ज़ाम हैं, उनकी सफाई भी कम दिलचस्प नहीं है। जरनैल सिंह, रेणू बाला और शैली चौधरी तीनों का एक ही बयान है कि उन्होंने अपना वोट दिखाकर डाला। सियासत में जब इतने लोग एक जैसी जुबान बोलने लगें, तो मामला सीधा कम और सेटिंग वाला ज्यादा लगता है। उधर मोहम्मद इजराइल और मोहम्मद इलियास की खामोशी भी अपने आप में एक इशारा है कि कुछ बातें पर्दे के पीछे ही रहने दी जा रही हैं।
गिनती का खेल और वफादारी की असली कीमत
अब कहानी में नया मोड़ तब आता है जब भरत बेनीवाल और इंदुराज नरवाल के नाम भी सामने आते हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने भी वोटिंग की गोपनीयता को तोड़ने की कोशिश की। अगर आखिरी वक्त पर रोक न लगती, तो मामला और बड़ा हो सकता था। इसका मतलब साफ है कि गिनती सिर्फ पांच या नौ तक सीमित नहीं, बल्कि ग्यारह तक जा पहुंचती है। यानी मामला मामूली गड़बड़ी का नहीं, बल्कि एक बड़े सियासी खेल का हिस्सा लगता है।
खामोशी भी बोलती है, बस सुनने वाला चाहिए
सबसे ज्यादा दिलचस्प बात कांग्रेस नेतृत्व की खामोशी है। जिन चार विधायकों के वोट रद्द हुए, उनके नाम और भूमिका पर खुलकर बात नहीं की जा रही। कोशिश यही दिखती है कि चर्चा सिर्फ क्रॉस वोटिंग तक सीमित रहे और असली फितना बाहर न आए। क्योंकि अगर यह खुल गया कि वोट जानबूझकर गलत तरीके से डाले गए, तो मामला सीधा अनुशासनहीनता से निकलकर साज़िश की शक्ल ले सकता है।
ठीकरा फोड़ो और बच निकलो की राजनीति
पहले इस पूरे मामले का ठीकरा कुमारी शैलजा के गुट पर फोड़ने की कोशिश हुई। अफवाहों का बाज़ार गर्म हुआ, लेकिन बात ज्यादा दूर तक नहीं चली। फिर नाम छुपाने का दौर शुरू हुआ। सियासत में जब सच्चाई कमज़ोर पड़ने लगती है, तो अफवाहें ताकतवर हो जाती हैं।
धरना, नाराज़गी और सियासी अभिनय का मंच
इसी बीच गोकुल सेतिया और कुलदीप वत्स ने जो सियासी ड्रामा किया, उसने पूरी कहानी को और रंगीन बना दिया। एक नाम उजागर करने की मांग पर धरने पर बैठ गया, दूसरा नाराज़ होकर अलग अंदाज़ में विरोध जताने लगा। आखिरकार मामला इतना बढ़ा कि खुद हुड्डा को सामने आकर स्थिति संभालनी पड़ी।
जनता की उलझन और सियासत का रहस्य
अब आम जनता यह सोचने पर मजबूर है कि आखिर ये सब हो क्या रहा है। कौन किसके साथ है और कौन किसके खिलाफ, यह समझना मुश्किल होता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि दोनों कहावतें एक साथ सच लगती हैं। एक तरफ लगता है कि हर शाख पर बैठे लोग अपने अपने मतलब में लगे हैं, दूसरी तरफ यह भी एहसास होता है कि रखवाले ही खेत को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
रेफरी भी अपना, टीम भी अपनी, फैसला भी अपना
अब सबसे अहम सवाल यह है कि कांग्रेस नेतृत्व के पास विकल्प क्या है। शो कॉज नोटिस जारी हो चुके हैं। कार्रवाई होती है तो पार्टी को नुकसान होगा, और अगर नहीं होती तो संदेश जाएगा कि सब कुछ चलने दिया जाएगा। कुछ विधायक ऐसे भी बताए जा रहे हैं जो शायद किसी और सियासी ठिकाने की तलाश में हैं और बस सही वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं।
सियासत का खेल और बेहतर टीम की तलाश
पूरा मामला अब एक ऐसे मैच की तरह हो गया है जिसमें खिलाड़ी अपना खेल खेल चुके हैं और अब फैसला रेफरी के हाथ में है। लेकिन दिक्कत यह है कि टीम भी उसी की है और फैसला भी उसी को करना है। ऐसे में जो भी निर्णय होगा, असर अपनी ही टीम पर पड़ेगा।
तमाशा जारी है, अगला दृश्य बाकी है
आज की सियासत में वफादारी से ज्यादा मौके की अहमियत है। हर खिलाड़ी बेहतर टीम की तलाश में रहता है। हरियाणा कांग्रेस का यह पूरा घटनाक्रम अब सिर्फ एक विवाद नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा तमाशा बन गया है जिसे जनता गौर से देख रही है। अब देखना यह है कि फैसला कब आता है और सियासत का यह नाटक किस मोड़ पर जाकर रुकता है। (Haryana Congress)
