Karnal में गवर्नर से मुलाकात के बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा की प्रेस वार्ता कोई ठोस राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक ऐसा बचावनामा थी जिसमें हर जवाब के पीछे एक नई सफाई और हर सफाई के पीछे एक नया सवाल खड़ा होता गया। लहजा ऐसा कि जैसे हकीकत से नहीं, हकीकत के असर से बचने की कोशिश हो रही हो। चेहरा गवाही दे रहा था कि मामला साधारण नहीं, बल्कि सियासी झटके का है।
घर में आग, और इल्जाम पड़ोसी पर
राज्यसभा चुनाव में जो हुआ, वह किसी साजिश से ज्यादा एक अंदरूनी बिखराव की कहानी कहता है। पांच विधायक लाइन से बाहर चले गए, चार वोट रद्द हो गए और हुड्डा साहब फरमा रहे हैं कि क्रॉस वोटिंग उनकी नहीं, भाजपा की हुई है। यह बयान कम, एक सियासी करिश्मा ज्यादा लगता है। अपने ही घर में आग लगी हो और इल्जाम पड़ोसी के चूल्हे पर लगाया जाए, तो बात हजम नहीं होती।
नाम मालूम, मगर जुबान खामोश
हुड्डा कहते हैं नाम मालूम हैं, हाईकमान को भेज दिए हैं, जल्द कार्रवाई होगी। यह वही पुराना जुमला है जिसमें सच्चाई को फाइलों में दफन कर दिया जाता है और जनता को सब्र का पैगाम दे दिया जाता है। सवाल यह है कि अगर नाम मालूम हैं तो ऐलान क्यों नहीं। आखिर कौन से ऐसे चेहरे हैं जिनकी हिफाजत इतनी जरूरी हो गई कि सच भी पर्दे के पीछे खड़ा कर दिया गया।
रद्द वोट या रद्द जिम्मेदारी
चार वोट रद्द होने पर जो दलील दी गई, वह और भी दिलचस्प है। कहा गया कि वोट वैध थे, पहले स्वीकार किए गए, फिर रद्द कर दिए गए। यह बयान सुनकर लगता है जैसे पूरी चुनाव प्रक्रिया कोई तमाशा हो और जिम्मेदारी किसी की नहीं। अगर वोट सच में दुरुस्त थे तो उसी वक्त हंगामा क्यों नहीं हुआ। काउंटिंग एजेंट क्या सिर्फ दर्शक बने बैठे थे। या फिर यह सब कुछ जानते-बूझते हुआ और अब उस पर परदा डालने की कोशिश हो रही है।
अनजान बनने का हुनर, सियासत का पुराना हथियार
मनीष ग्रोवर पर “कौन है, मैं नहीं जानता” कहना तो सियासत का वह अंदाज है जिसे अवाम खूब पहचानती है। यह अनजान बनने का हुनर तब अपनाया जाता है जब जवाब देना मुश्किल हो जाए। हरियाणा की सियासत में सक्रिय शख्स को न पहचानना कोई मासूमियत नहीं, बल्कि साफ बचाव की चाल है।
जवाब कम, इल्जाम ज्यादा
पूरी प्रेस वार्ता में एक अजीब सा पैटर्न नजर आया। जिम्मेदारी से इनकार, विपक्ष पर इल्जाम और कार्रवाई का वादा। लेकिन न जिम्मेदारी दिखी, न कार्रवाई। सिर्फ बयानबाजी का शोर था और हकीकत की खामोशी।
पार्टी के भीतर का खेल, या नेतृत्व की नाकामी
असल सवाल यह है कि कांग्रेस के भीतर ऐसा कौन सा खेल चल रहा है जहां विधायक अपनी ही पार्टी को नुक्सान पहुंचा दें और नेतृत्व को खबर तक न हो। या खबर हो और खामोशी ओढ़ ली जाए। दोनों ही सूरतें सियासी नाकामी की खुली तस्दीक हैं।
सबसे बड़ा सवाल, जिसका जवाब गायब
क्या राज है जिसकी पर्दादारी है।
हार नहीं, भरोसे का जनाजा
यह पूरा मामला किसी एक चुनाव का नहीं, बल्कि उस सियासी गिरावट का आईना है जिसमें पार्टी अपने ही लोगों से मात खा रही है। हुड्डा साहब की प्रेस वार्ता में जवाब कम और बचाव ज्यादा था, हकीकत कम और तर्क ज्यादा थे। और जब सियासत में तर्क हकीकत पर भारी पड़ने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि मामला गहरा है।
अवाम की अदालत में लंबित फैसला
दिव्य हरियाणा की साफ राय है कि यह सिर्फ हार नहीं, बल्कि भरोसे का टूटना है। गद्दारों के नाम अगर अब भी छुपाए जाते हैं, तो यह केवल देरी नहीं, बल्कि इरादा माना जाएगा। और सियासत में इरादे ही इतिहास लिखते हैं।
पर्दा उठेगा, हिसाब भी होगा
हुड्डा साहब, अवाम सब देख रही है। सवाल अभी जिंदा हैं, जवाब अभी बाकी हैं, और सियासत में हर पर्दा एक दिन उठता जरूर है।
