Haryana Congress : हरियाणा राज्यसभा चुनाव 2026 ने एक बार फिर कांग्रेस की अंदरूनी सच्चाई को पूरी तरह उजागर कर दिया है। कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर सिंह बौद्ध की जीत भले ही कागजों में दर्ज हो गई हो, लेकिन जिस तरह पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की और चार वोट रद्द हुए, उसने पार्टी के अनुशासन, नेतृत्व और एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह जीत कम और चेतावनी ज्यादा है। यह संकेत है कि पार्टी अंदर से कितनी खोखली हो चुकी है।
जिम्मेदारी तय करने का बड़ा सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी कौन लेगा। और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा इस बार भी अपनी जिम्मेदारी से बच निकलेंगे या फिर इस बार जवाबदेही तय होगी।
हाईकमान की सख्ती के संकेत
Haryana Congress हाईकमान ने इस मामले को हल्के में नहीं लिया है। पांच विधायकों के नाम दिल्ली भेजे जा चुके हैं। शो कॉज नोटिस जारी होने की पूरी संभावना है और निलंबन या निष्कासन जैसे कड़े कदम भी उठाए जा सकते हैं। कुछ विधायकों के इस्तीफे की चर्चा भी चल रही है। अगर यह सच साबित होती है तो उपचुनाव की नौबत आ जाएगी। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी को अतिरिक्त राजनीतिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। लेकिन असली मुद्दा अनुशासनहीन विधायक नहीं, बल्कि वह नेतृत्व है जो अनुशासन लागू कराने में नाकाम साबित हो रहा है। और यहां पर सवाल सीधा भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व पर खड़ा होता है।
नेतृत्व पर नियंत्रण की कमी
हुड्डा सिर्फ एक नेता नहीं हैं, बल्कि विधायक दल के नेता हैं। हाईकमान ने उन्हें पूरे 37 विधायकों की जिम्मेदारी सौंपी थी। उन्होंने विधायकों को एकजुट रखने के लिए कुफरी भेजा, निगरानी की, रणनीति बनाई, लेकिन इसके बावजूद पांच विधायक क्रॉस वोटिंग कर गए। इसका सीधा मतलब है कि या तो उनका नियंत्रण कमजोर है या फिर उनके नेतृत्व पर भरोसा नहीं रहा।
Haryana Congress जिम्मेदारी से बचने की कोशिश
हुड्डा अब यह कहकर बचने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने नाम हाईकमान को भेज दिए हैं। लेकिन यह तर्क राजनीतिक रूप से बेहद कमजोर है। नाम भेज देना जिम्मेदारी निभाना नहीं होता, यह तो सिर्फ औपचारिकता निभाने जैसा है। असली जिम्मेदारी यह थी कि क्रॉस वोटिंग होती ही नहीं और विधायक दल एकजुट रहता। यह पूरी स्थिति बताती है कि नेतृत्व नियंत्रण बनाए रखने की मूल परीक्षा में ही विफल रहा।
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गुटबाजी का गहराता संकट
यह भी कहा जा रहा है कि क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायक शैलजा गुट से जुड़े हैं। लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है। अगर ऐसा है भी तो सवाल और गंभीर हो जाता है कि हुड्डा अपने ही दल के भीतर गुटबाजी को खत्म क्यों नहीं कर पाए। अगर विधायक दल के नेता होते हुए भी वे अपने ही विधायकों को नियंत्रित नहीं कर सकते तो फिर उनका नेतृत्व किस काम का है।
इतिहास भी नहीं देता राहत
हकीकत यह है कि इतिहास भी हुड्डा के पक्ष में खड़ा नहीं दिखता, बल्कि उनके खिलाफ गवाही देता नजर आता है। यह पहली बार नहीं है जब उनके नेतृत्व में कांग्रेस राज्यसभा चुनाव में फजीहत का शिकार हुई हो।
2016 का ‘इंक गेट’ विवाद
2016 का राज्यसभा चुनाव हरियाणा की राजनीति का सबसे बड़ा विवाद बना था। उस समय कांग्रेस उम्मीदवार आर के आनंद थे। चुनाव के दौरान कांग्रेस के 14 वोट रद्द हो गए थे। वजह थी गलत तरीके से वोट डालना। लेकिन इसे सिर्फ तकनीकी गलती नहीं माना गया, बल्कि यह राजनीतिक प्रबंधन की पूरी विफलता के रूप में देखा गया। इस पूरे घटनाक्रम को ‘इंक गेट’ घोटाले के नाम से जाना जाता है। इसका सीधा फायदा भाजपा समर्थित सुभाष चंद्रा को मिला था और वे जीत गए थे।
2022 में माकन की हार
इसके बाद 2022 का राज्यसभा चुनाव आया। अबकी बार Haryana Congress के उम्मीदवार अजय माकन थे। इस बार भी कहानी लगभग वही रही थी। क्रॉस वोटिंग हुई, एक वोट रद्द हुआ और अजय माकन मात्र एक वोट से हार गए। यानी दो अलग-अलग चुनाव, लेकिन समस्या वही रही—नेतृत्व का कमजोर नियंत्रण और गुटबाजी का असर।
2026: जीत के बावजूद संकट कायम
अब 2026 में वही कहानी तीसरी बार दोहराई गई है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उम्मीदवार जीत गया, लेकिन पार्टी की अंदरूनी कमजोरी फिर से उजागर हो गई। तीन बार एक जैसी चूक होना किसी संयोग का परिणाम नहीं हो सकता। यह साफ संकेत है कि समस्या सिस्टम में है और उस सिस्टम के केंद्र में भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं।
गुट पर दोष डालने की सीमाएं
हुड्डा के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि शैलजा गुट जिम्मेदार है। लेकिन यह तर्क भी ज्यादा देर तक नहीं टिकता। क्योंकि विधायक दल का नेता पूरे दल का होता है, किसी एक गुट का नहीं। गुटबाजी अगर चरम पर है तो उसे खत्म करने की जिम्मेदारी भी नेता की होती है।
पुराने दौर से तुलना
भजन लाल के दौर में भी Haryana Congress में मतभेद थे, लेकिन उस स्तर की गुटबाजी और अनुशासनहीनता नहीं थी जैसी आज देखने को मिल रही है। इसका सीधा मतलब है कि मौजूदा नेतृत्व स्थिति को संभालने में असफल रहा है।
नेतृत्व की वास्तविक कमान पर सवाल
आज स्थिति यह है कि प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह हैं, लेकिन असली कमान किसके हाथ में है यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करना न केवल राजनीतिक रूप से गलत है बल्कि यह पार्टी के भविष्य के लिए भी खतरनाक है।
हाईकमान के सामने निर्णायक चुनौती
Haryana Congress हाईकमान के सामने अब एक बड़ी चुनौती है। अगर इस बार भी सिर्फ नोटिस देकर मामला ठंडा कर दिया गया तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी में अनुशासन की कोई कीमत नहीं है। लेकिन अगर सख्त कार्रवाई होती है और जिम्मेदारी तय की जाती है तो शायद संगठन में सुधार की शुरुआत हो सकती है।
भविष्य के लिए चेतावनी
यह मामला सिर्फ पांच विधायकों का नहीं है। यह पूरे हरियाणा कांग्रेस की कार्यशैली, नेतृत्व और भविष्य का आईना है। अगर अब भी सबक नहीं लिया गया तो 2027 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए और भी कठिन साबित हो सकता है।
अब फैसला हाईकमान के हाथ में
अब फैसला हाईकमान को करना है कि वह सिर्फ लक्षणों का इलाज करेगा या उस नेतृत्व पर भी सवाल उठाएगा जिसकी निगरानी में यह बीमारी बार-बार सिर उठा रही है। (Haryana Congress)
