Haryana Congress की सियासत बरसों से गुटबाज़ी, जातिगत समीकरण और कुर्सी की कशमकश का अखाड़ा बनी हुई है। इस मैदान में दो चेहरे सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहते हैं—कुमारी शैलजा और भूपेंद्र सिंह हुड्डा। बिना लाग-लपेट के कहा जाए तो शैलजा पार्टी आलाकमान, खासकर गांधी परिवार की नज़र में एक भरोसेमंद और वफादार चेहरा हैं। वहीं हुड्डा गुट की ताकत जाट वोट बैंक पर टिकी रही है। यानी एक तरफ एतबार, दूसरी तरफ असर—और कांग्रेस इन दोनों के बीच झूलती हुई दिखाई देती है।
ख्वाहिश से परहेज़: शैलजा का ‘खामोश दांव’
कुमारी शैलजा उन नेताओं में शुमार हैं जिन्होंने कभी खुलकर कुर्सी की तमन्ना जाहिर नहीं की। ना जोड़-तोड़, ना पर्दे के पीछे की साज़िश—बस पार्टी लाइन पर सलीके से चलना। यही वजह है कि उनकी छवि साफ-सुथरी और वफादारी से लबरेज़ रही। मगर सियासत का दस्तूर अलग है—यहां “जो दिखता है, वही बिकता है।” शायद यही वजह रही कि कई बार उन्हें हाशिए पर रखा गया।
टिकट का तजुर्बा: वफादारी बनाम ‘मैनेजमेंट’
विधानसभा चुनाव में शैलजा ने खुद मैदान में उतरने की ख्वाहिश जताई, लेकिन टिकट नहीं मिला। सियासी गलियारों में इसे हुड्डा गुट की जीत के तौर पर देखा गया। जानकारों का मानना है कि अगर शैलजा चुनाव लड़तीं, तो कांग्रेस को चुनावी बढ़त मिल सकती थी। मगर यहां भी वही पुराना फॉर्मूला चला—जिसकी पकड़ मजबूत, उसकी टिकट पक्की।
ताज का खौफ: कहीं कुर्सी हाथ से न फिसल जाए
हालिया चुनाव में शैलजा को संभावित मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर देखा जा रहा था। उनकी बढ़ती चर्चा ने सियासी हलकों में बेचैनी बढ़ा दी। यह आशंका जताई गई कि अगर कांग्रेस ज्यादा सीटें ले आती, तो सत्ता का ताज हाथ से निकल सकता था। ऐसे में चर्चाएं रहीं कि पार्टी को 45-50 सीटों के दायरे में ही “महफूज़” रखने की कोशिश हुई। नतीजा वही—ना जीत मुकम्मल, ना हार कारगर… बस “ना खुदा मिला, ना विसाले सनम।”
दलित कार्ड या सियासी शतरंज: राज्यसभा का उलझा खेल
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने कर्मवीर बौद्ध को उम्मीदवार बनाकर दलित कार्ड खेला। मंशा साफ थी—दलित वोट बैंक को साधना। लेकिन वोटिंग के दिन पूरा खेल उलझ गया। पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की और चार वोट रद्द हो गए—यानी नुकसान यहीं से शुरू हो चुका था।
आत्मघाती चाल: जब अपने ही वोट खतरे में पड़ जाएं
अंदरखाने यह चर्चा भी तेज रही कि दो विधायकों—इन्दुराज नरवाल उर्फ भालू और एक अन्य—ने गोपनीयता भंग कर अपने वोट रद्द करवाने की कोशिश की। मगर ऐन वक्त पर दखल देकर यह सियासी आत्मघाती कदम रोक लिया गया। क्योंकि हालात पहले ही बिगड़ चुके थे—क्रॉस वोटिंग और रद्द वोटों से नुकसान हो चुका था। अगर ये दो वोट और रद्द हो जाते, तो कांग्रेस सीधे चुनाव हार जाती। यानी यहां “नौ दो ग्यारह” का खेल विरोधियों का नहीं, खुद अपनी गिनती मिटाने वाला बन जाता।
सियासी याददाश्त: जब अतीत आईना दिखाए
अब हुड्डा गुट यह कहकर शोर मचा रहा है कि दलित उम्मीदवार को हराने की कोशिश हुई। लेकिन सियासत का अतीत भी कभी-कभी आईना दिखा देता है। वही दौर याद आता है जब प्रदेशाध्यक्ष रहते दलित नेता अशोक तंवर के साथ मारपीट के आरोप लगे थे। दूसरी तरफ, जब शैलजा प्रदेशाध्यक्ष थीं, तो उन्हें संगठन खड़ा करने तक की छूट नहीं दी गई—हर कदम पर रुकावट, हर मोड़ पर सियासी दीवार।
चोर मचाए शोर: इल्ज़ामों का सियासी कारोबार
राज्यसभा चुनाव जीतने के बाद भी पार्टी में सुकून नहीं आया। पहले बागी विधायकों को शैलजा गुट से जोड़कर बदनाम करने की कोशिश हुई। जब यह दांव नहीं चला, तो प्रेस वार्ताओं में नया शोर खड़ा किया गया—कि दलित और गरीब के बेटे को रोकने की साजिश हुई। यानी सियासत में अक्सर हकीकत कम, हंगामा ज्यादा बिकता है।
अंजाम: एकता का रास्ता या “नौ-दो ग्यारह” का सिलसिला?
पूरा घटनाक्रम साफ करता है कि हरियाणा कांग्रेस एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ शैलजा जैसी विश्वसनीय और दलित चेहरा, जो स्थिरता दे सकता है। दूसरी तरफ हुड्डा गुट की जमीनी पकड़, जो चुनाव जिताने की ताकत रखती है। अगर इन दोनों का तालमेल बैठा, तो कांग्रेस नई ऊंचाइयों को छू सकती है। वरना “नौ दो ग्यारह” का यह खेल यूं ही चलता रहेगा—जहां हर चाल में नुकसान ही नुकसान नजर आएगा।
