Breaking: याची रमेश को नवंबर 1993 में करनाल की अदालत ने हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सजा के खिलाफ उसने मार्च 2026 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब 32 साल बाद अपील दायर होने पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में इतनी लंबी देरी किसी भी हालत में स्वीकार नहीं की जा सकती और अब इस पीड़ा को और नहीं बढ़ाया जा सकता।
कोर्ट ने बताया कि 1992 के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति ने लगभग 32 वर्ष जेल में बिताए, लेकिन इस दौरान उसकी ओर से अपील तक दाखिल नहीं की गई। हाईकोर्ट के अनुसार, दोषी करीब 11,740 दिनों की देरी के बाद अपील लेकर पहुंचा, जो अपने आप में गंभीर मामला है।
कानूनी सहायता प्रणाली पर उठे सवाल
जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की बेंच ने कहा कि इतने लंबे समय तक कैद के बावजूद अपील न होना चिंताजनक है। अगर आरोपी खुद अपील दाखिल नहीं कर सका, तो यह जेल प्रशासन की जिम्मेदारी थी कि वह आवश्यक कदम उठाता।
पीठ ने कानूनी सहायता प्रणाली की निष्क्रियता पर भी चिंता जताई और कहा कि इसकी कमी का खामियाजा दोषी को नहीं भुगतना चाहिए। कोर्ट ने माना कि यह मामला न्याय व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है। 32 साल की देरी को माफ करते हुए हाईकोर्ट ने अपील को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया और ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड तलब किया। अगली सुनवाई 2 मई को निर्धारित की गई है।
कैसे पहुंचा मामला सुनवाई तक
मार्च 2026 में करनाल जिला जेल के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ने रमेश की अपील से जुड़ी अर्जी हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी को भेजी। इसके बाद यह मामला अधिवक्ता संजीव शर्मा को सौंपा गया। दस्तावेज तैयार करते समय सामने आया कि अपील दाखिल करने में करीब 11,740 दिनों की देरी हुई है। वकील ने देरी माफ करने की मांग की, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
हाईकोर्ट ने करनाल जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को निर्देश दिया है कि वे स्पष्ट करें कि इतने वर्षों तक अपील क्यों नहीं दाखिल हुई और संबंधित मामलों में कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
क्या था पूरा मामला
रमेश को 19 नवंबर 1993 को करनाल की सत्र अदालत ने हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 500 रुपये जुर्माने की सजा दी थी। अभियोजन के अनुसार, 27 फरवरी 1992 की शाम पुरानी रंजिश के चलते रमेश और उसके पिता फूल सिंह ने प्रीतम सिंह पर चाकू से हमला किया था, जिसकी अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई थी। इस घटना के चश्मदीद गवाह मृतक के भाई प्रताप सिंह और नारायण सिंह थे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर कैदी को समय पर न्याय तक पहुंच का अधिकार है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा।
